प्राथमिक विद्यालय सेमरा को शून्य से शिखर की ओर अग्रसर किया राजेश सिंह ने
प्राथमिक विद्यालय सेमरा को शून्य से शिखर की ओर अग्रसर किया राजेश सिंह ने
भेटुआ।
लहरों से डरकर नौका कभी पार नहीं होती, कोशिश करने वाले की कभी हार नहीं होती...इसको सच कर दिखाया है अमेठी जनपद के भेटुआ विकास खण्ड के प्राथमिक विद्यालय सेमरा के प्रधानाध्यापक राजेश सिंह ने।जब मई 2015 में राजेश सिंह ने प्राथमिक विद्यालय सेमरा का चार्ज लिया था तो विद्यालय की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी...या यों कहे कि विद्यालय बन्द होने के कगार पर था तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।लेकिन राजेश सिंह ने विद्यालय की भौतिक स्थिति को सही करने की ठानी,सही करने के लिए खाते में कोई मद नहीं बची थी।राजेश सिंह ने अपने धन से विद्यालय की फर्श को दुरुस्त कराते हुए प्रधानाध्यापक कार्यालय को सुसज्जित किया जिसकी तारीफ अमेठी के उपजिलाधिकारी ने अपने निरीक्षण के समय की थी।राजेश सिंह की जो सबसे खास बात लोगों को प्रभावित करती है वह है समयपालन।चाहे गर्मी,बरसात,जाड़े का मौसम हो,राजेश सिंह कभी विद्यालय लेट नहीं पहुँचते।गाँव के निवासी रामदेव ने बातचीत के दौरान बताया कि हमारे प्रधानाध्यापक सबसे पहले विद्यालय आ जाते हैं और अपना काम पूरी ईमानदारी से करते हैं तभी यहाँ नर्सरी से नाम कटाकर बच्चे प्रवेश ले रहे है।एक अन्य अभिभावक राजेन्द्र कुमार ने बताया कि हमारे यहाँ जब से राजेश सर आए हैं तब से इन्होंने विद्यालय का पूरा परिदृश्य ही बदल दिया है।विद्यालय के साथ-साथ राजेश सिंह समाजसेवा में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं।कोरोना काल में कई मरीजों को भर्ती कराते हुए उनके इलाज की समुचित व्यवस्था कराई।एक अभिभावक राजकुमार के पुत्र की प्लेटलेट्स बहुत डाउन हो गई थी उसे भर्ती कराते हुए उसको प्लेटलेट्स की व्यवस्था राजेश सिंह ने कराई जिसके कारण अब वह एकदम स्वस्थ है। यहाँ बताते चलें कि राजेश सिंह ने पिछले साल अपने बजट से विद्यालय को सीसीटीवी कैमरे और स्मार्ट टी वी से आच्छादित कर दिया था जिसकी सराहना उद्घाटन करने आए जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने भी की थी।विद्यालय का भौतिक परिवेश इतना आकर्षक बना दिया गया है कि रास्ते से गुजरने वाले हर व्यक्ति की नजर जब पड़ती है तो रुककर देखने लगता है।कहा है कि जहाँ चाह, वहाँ राह...इसे सच कर दिखाया है राजेश सिंह ने।यहाँ छात्र संख्या 213 है और बच्चों को सिखाने के लिए प्रोजेक्टर और स्मार्ट टी वी की व्यवस्था राजेश सिंह ने अपने पास से की है।अन्त में ये पंक्तियाँ राजेश सिंह के लिए सटीक बैठती हैं कि ढूँढ़ लेते हैं जुगनू अँधेरों में भी मंजिल, क्योंकि जुगनू कभी रोशनी के मोहताज नहीं होते..।
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