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आधुनिकता की भेंट चढ़े देशी फ्रिज

आधुनिकता की भेंट चढ़े देशी फ्रिज 
नहीं रह गए मिट्टी के बर्तनों के खरीदार
मुंशीगंज।
पानी की तरह शीतल पेयों का बाजार भी गांवों तक पहुंच गया है। गर्मी के मौसम में देशी फ्रिज के रूप में प्रयोग किए जाने वाले घड़े और सुराहियां अब गांवों में भी नहीं दिखते हैं। ज्येष्ठ की दोपहरी में आईसक्रीम की तरह गन्ने का जूस  अब गांव गांव बिक रहा है।
एक दशक पहले तक लोग गर्मी के मौसम में घड़े का पानी पीते थे। ज्येष्ठ का महीना लगते ही महिलाएं बाजारों से घड़े और सुराहियां खरीद लाती थी। मिट्टी के बर्तन बेचकर परिवार की रोजी- रोटी चलाने वाले बाबूलाल के बताया कि अब बर्तनों की बिक्री बहुत कम हो गई है। केवल कुल्हड़ ही साल भर बिकते हैं। अनाज रखने वाले बड़े बर्तन बनाना हम लोगों ने बन्द कर दिया है। अधिकांश परिवार अपने घर पर फ्रिज का प्रयोग कर रहे हैं।
पानी के साथ तेजी से बढ़ रहा शीतल पेयों का बाजार
कंुओं के निष्प्रयोज्य होने के कारण गांवों में पानी के संसाधन लगातार कमजोर हो रहे हैं। जनप्रतिनिधियों की ओर से रेवड़ी की तरह बांटे गए हैण्डपम्प लोगों की पेयजल आवश्यकता नहीं पूरी कर पा रहे हैं। आरओ वाटर के नाम पानी बेचने वाली छोटी-छोटी कम्पनियां गांवों में पानी बेच रही है। वैवाहिक आयोजनों में बफर सिस्टम से भोजन बनाने का काम करने वाले पप्पू पाण्डेय ओर गोलू गुप्ता ने बताया कि अब गांवों में 25 से 40 फीसदी परिवार बाजार से रोज बड़ा बोतल खरीदकर पानी पी रहे हैं। गन्ने का जूस बेचने वाले, आईसक्रीम बेचने वाले लोगों की तरह गांव गांव टहल रहे हैं। शिक्षक अब्दुल रसीद और इन्द्रपाल ने कहा कि पानी का बाजार भविष्य के लिए बहुत ही खतरनाक है। अभी समय है,लोगों को प्राकृतिक जल स्रोतो का संरक्षण करना चाहिए। पानी पीने के लिए कुंए से अच्छा स्रोत कोई नहीं है। हारीपुर व घटकौर के मनोज कुमार व हरिपाल ने बताया कि हमारे गांव में अभी लोग कुंए से पानी पीते हैं। पानी स्वच्छ रहता है।


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