पढने की उम्र मे कबाड़ बिन रहे बच्चे
पढने की उम्र मे कबाड़ बिन रहे बच्चे
बेमानी साबित हो रहा शिक्षा गारंटी अधिनियम
ललित भारती
अमेठी।
नगर में प्रदेश के अन्य जनपदों से आने वाले बच्चें कूडा बिनकर अपनी जिन्दगी काट रहे हैं। संवैधानिक व्यवस्थाओं को दरकिनार कर बच्चों के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ पर जिम्मेदार मौन हैं। ईंट भट्टों और होटलों पर बाल श्रम की शिकायतें शून्य नहीं हो पा रही हैं। छः से चौदह वर्ष के बच्चों को अनिवार्य औऱ निःशुल्क शिक्षा देने के सरकारी प्रयास बेमानी साबित हो रहे हैं।
मंगलवार को बस स्टेशन के पास 10 वर्ष आयु से कम तीन बालिका कूडा बिन रही थी। कूडा बिन रही बालिकाओं से विश्ववार्ता ने बातचीत की। कूडा बिन रही वर्षा, पारूल और महक ने बताया कि उनका मूल जनपद बाराबंकी है। उनके मम्मी-पप्पा अमेठी बाईपास के पास झुग्गी बनाकर रहते हैं। सुबह खाना खाने के बाद झुग्गी से निकल जाते हैं और दिन भर नगर में कूडा बिनते हैं। शाम को उसे बेचकर झुग्गी पर चले जाते हैं। हम सब स्कूल कभी नहीं गए है। पढाई करने से क्या होगा। सब पढे,सब बढे का स्लोगन इन बच्चों पर लागू नहीं हो पाया है। इसी तरह के एक दर्जन से अधिक छोटे-छोटे बच्चे नगर में कूडा बिनकर अपने मां-बाप का सहयोग करते है।
इनसेट
साल 2021 में 29 बाल श्रमिक चिंहित किए गए
अमेठी।
बाल श्रम उन्मूलन को श्रम विभाग की ओर से समय समय पर अभियान चलाया जाता है।अभियान के बावजूद गरीबी का दुष्चक्र सरकार की मंशा को सफल नहीं होने दे रहा है।परिवार की रोजी रोटी चलाने के लिए बडी संख्या मे बच्चे अभी भी होटलों और ढाबों पर काम कर रहे हैं।ईंट भट्ठों पर भी सैकड़ों बच्चे पढने की उम्र मे दिहाड़ी कर रहे हैं।
पिछले एक साल के भीतर श्रम विभाग ने अभियान चलाकर 29 बाल श्रमिक चिन्हित किए हैं। श्रम प्रवर्तन अधिकारी अखिलेश वर्मा ने बताया कि विभाग की ओर से बाल श्रमिकों के पुनर्वास की व्यवस्थाएं की गई हैं।
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