यहां समाधि के दर्शन मात्र से ठीक हो जाते हैं पागल
यहां समाधि के दर्शन मात्र से ठीक हो जाते हैं पागल
आध्यात्म एवं संस्कृत शिक्षा का केंद्र है टीकरमाफी
आश्रम
स्वामी परमहंस आश्रम टीकरमाफी
अमेठी।
टीकरमाफी स्थित स्वामी परमहंस आश्रम आध्यात्म एवं संस्कृत
शिक्षा के के साथ तकनीकी शिक्षा का केन्द्र
भी बना हुआ है। ट्रिपल आईटी बन्द होने के बाद यहां बाबा साहब डा अम्बेडकर यूनिवर्सिटी
के सेटेलाइट सेन्टर में सैकड़ों छात्र छात्राएं विज्ञान व तकनीकी की शिक्षा हासिल कर
रहे हैं। तपस्या के जीवंत स्थल के रूप में पहचान रखने वाले इस आश्रम की स्थापना स्वामी
परमहंस महाराज ने किया था। पागलों का ठीक होना, आरती के समय कुत्तों का रोना आश्रम
की अलौकिक शक्तियों का जीवंत उदाहरण है।
जनपद मुख्यालय से लगभग 23 किमी दूर स्थित स्वामी परमहंस
आश्रम टीकरमाफी जिले के पर्यटन व तीर्थ स्थलों में शामिल है। यहां इस समय यज्ञ व भण्डारे
का आयोजन चल रहा है। आश्रम अलौकिक शक्तियों की वजह से हमेशा से ही चर्चा के केंद्र
में रहा है। यहां जो भी आया खाली हाथ नही गया। यही कारण रहा कि पूर्व प्रधानमंत्री
स्व. राजीव गांधी आश्रम आकर हमेशा आशीर्वाद लेते रहे। आज भी उनके परिवार की निष्ठा
आश्रम से जुड़ी हुई है। वर्ष में दो बार भाद्रपद की पूर्णिमा तथा फाल्गुन शुक्ल की त्रयोदशी
को यहां यज्ञ एवं विशाल भंडारे का आयोजन होता है। स्थानीय लोगों की प्रार्थना पर ही
स्वामी जी ने आश्रम की स्थापना की थी।
इनसेट
अलोपी बाबा के नाम से श्रद्धालुओं के बीच लोक प्रिय
रहे स्वामी परम हंस महाराज
अमेठी जनपद के जामों स्थित कल्याणपुर गांव में सरयूपारी
ब्राह्मण रामानंद दुवेदी के यहां सन 1872 में स्वामी जी का जन्म हुआ था। स्वामी जी
का भविष्य बाल्यावस्था में ही परिलक्षित होने लगा था। आश्रम के श्रद्धालु संजय सिंह
व अच्छे लाल मौर्य ने बताया कि स्वामी जी बचपन में ही हम उम्र के बच्चों के साथ आध्यात्म
की चर्चा व योगलीला का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था। बाल्यावस्था में ही स्वामीजी
को लेकर इनके पिता बाराबंकी अपने शिष्य के यहां गए। दूसरे दिन पिता ने स्वामी जी को
गोमती नदी से जल लाने को कहा। गोमती नदी के तट पर स्वामी जी जैसे ही पहुंचे तेज अंधड़
से उनकी आंखें रेत से भर गई और वे बेहोश होकर गिर गए। कहा जाता है कि साधु भेषधारी
भगवान शंकर के स्पर्श से स्वामी जी आंखें खुली। विलम्ब होते देख पिता जी वहां पर पहुंचे
तो स्वामी जी ने उन्हें पूरा वृतांत बताया। पिता की मृत्यु के उपरांत बाल्यावस्था में
ही स्वामी जी ने मां के पैर छूकर चुपचाप घर का त्याग कर तपस्या करने निकल पड़े। चित्रकूट
में इन्हें दिव्य पुरुष से भेंट हुई। मन्दाकिनी का तट, व्ध्यियपर्वत व चित्रकूट का
भ्रमण करते स्वामी जी उत्तराखंड पहुंचे। यहां इनकी तपस्या को देखकर एक स्वामी ने दीक्षा
देकर इनका नामकरण किया। रामदास द्विवेदी से 'श्रीमत परमहंस परिवाजकाचार्य श्रोत्रिय
ब्रह्मनिष्ठ 1008 स्वामी देवानन्द सरस्वती महाराज जी ' घोषित किया। स्वामी जी दिगम्बर
रूप में रहा करते थे। गोमती नदी के तट पर विचरण करते स्वामी जी अमेठी के पिंडॉरिया
गांव के जंगल में पहुंचे। स्वामी जी को यहां कुछ ग्रामीणों ने देखा तो ये लुप्त हो
गए। यहीं इनका नाम अलोपी बाबा पड़ा। क्षेत्रीय लोगों के अनुनय विनय पर स्वामी जी टीकरगांव
में आश्रम की स्थापना की।यह आश्रम पिछले 150 साल से आध्यात्म व शिक्षा का केन्द्र बना हुआ है। संस्कृत
को बढ़ावा देने के लिए स्वामी जी संस्कृत महाविद्यालय की आश्रम में ही स्थापना की। गुरुकुल
की तरह आज भी विद्यार्थियों संस्कृत की शिक्षा आश्रम में निःशुल्क दी जाती है। यहां
के विद्वान अपने प्रवचन एवं व्याख्यान से दूर दूर तक जनता का आध्यात्मिक पोषण करते
हैं।
अम्बेडकर विश्वविद्यालय का अंग बना आश्रम
अमेठी।
आश्रम के प्रबन्धक स्वामी हरिचैन्य की प्रेरणा से यूपीए सरकार ने यहां ट्रिपल
आईटी खोला था। राहुल गांधी के प्रयास से किसानों के लिए डिस्कवरी पार्क भी संचालित
हुआ। नमो सरकार ने ट्रिपल आईटी को बन्द करके यहां डा अम्बेडकर यूनवर्सिटी का सेटेलाइट
सेन्टर खोल रखा है। पहला बैच इसी वर्ष निकलने वाला है।

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